मध्यप्रदेश का गठन

0
125

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सी.पी. एण्ड बरार अपने पूर्व नाम और स्वरूप में 1950 तक कायम रहा। भारतीय गणतंत्र की स्थापना के बाद इस प्रदेश का नाम बदलकर मध्यप्रदेश कर दिया गया। इसकी राजधानी नागपुर रखी गई। प्रशासनिक दृष्टि से सन् 1948 तक यह प्रदेश चार कमिश्नरियों तथा 19 जिलों में विभाजित था, किन्तु बाद में कुछ नये जिलों का निर्माण किया गया। इसके बाद जिलों की संख्या बढ़कर 22 हो गई जो कि 111 तहसीलों में विभाजित किये गये। मध्य प्रांत ओर बरार का कुल क्षेत्रफल 98,575 वर्गमील था, किन्तु अब मध्यप्रदेश का क्षेत्रफल 1,30,272 वर्गमील हो गया जो कि सम्पूर्ण देश के क्षेत्रफल का 9.75 प्रतिशत था।
प्राकृतिक रचना की दृष्टि से इस प्रदेश के पांच भाग थे। यथा- विन्ध्यांचल की उच्चतम भूमि, नर्मदा का कछार, सतपुड़ा की उच्च समभूमि, मैदानी भाग (जिसमें बरार, नागपुर व छत्तीसगढ़ का मैदान तथा महानदी की कछार सम्मिलित था) और दक्षिण की उच्च समभूमि जिसमें अजंता, सिहावा तथा बस्तर की पर्वत-श्रेणियाँ शामिल थीं। नर्मदा, ताप्ती, वर्धा, बैनगंगा, इन्द्रावती, शिवनाथ, हसदेव तथा महानदी यहां की प्रमुख नदियां थीं जो कि राज्य के लिए सिंचाई, यातायात और जलविद्युत के साधन प्रस्तुत करती थीं। राज्य का 48 प्रतिशत भाग वनों से आच्छादित था, जो उसके विभिन्न उद्योगों और व्यवसायों को बहुमूल्य कच्चे माल की पूर्ति करता था।
यहाँ मुख्यत: गहरी काली भूमि, काली भुरभुरी भूमि, काली चिकनी भूमि, काली रेतीली भूमि, लाल रेतीली भूमि और लाल और पीली भूमि पाई जाती थी। गहरी काली, भूमि गेहूं की फसल के लिये अत्यन्त उपयोगी एवं नर्मदा और पूर्णा नदियों के कछारों में पाई जाती थी। काली भुरभुरी भूमि, जिसे ‘‘कपास की भूमि’’ भी कहते थे। कपास तथा ज्वार की फसलों के लिए बहुत उपयोगी थी।
जन-सम्पत्ति की दृष्टि से भी मध्यप्रदेश भरपूर था। उसके 142 नगरों व 48,444 ग्रामों में 2,12,47,533 जनसंख्या निवास करती थी। कुल जनसंख्या में से ग्रामीण व नगरीय जनसंख्या क्रमश: 87 तथा 13 प्रतिशत थी। अत: स्पष्ट है कि अधिकांश मध्यप्रदेश अपने बिखरे हुए ग्रामों में ही बसा हुआ था। ग्रामीण जनसंख्या में पुरुष-संख्या की अपेक्षा स्त्री-संख्या अधिक है, किन्तु नगरीय जनसंख्या में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की संख्या कम थी। यथा- ग्रामों में जबकि 91,67,850 पुरुष व 92,02,344 स्त्रियां रहती थीं तब शहरों में 1,494,962 पुरुष व 13,82,377 स्त्रियां थीं, किन्तु औसत रूप से राज्य में प्रति हजार पुरुष के पीछे स्त्रियों की संख्या 993 थी। अर्थात इस दृष्टि से पुरुष-संख्या की अपेक्षा स्त्री-संख्या कम थी।
मध्यप्रदेश का जन्म भारत की आजादी के साथ हुआ था। 1947 में ब्रिटिशकालीन प्रांत सेन्ट्रल प्रोविन्स एण्ड बरार में बघेलखंड व छत्तीसगढ़ की रियासतों को मिलाकर तत्कालीन मध्यप्रदेश राज्य बना था जो पार्ट-ए स्टेट था और इसकी राजधानी नागपुर थी।
1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर राज्य की सीमा में निम्नलिखित परिवर्तन किए गए :-
1. अकोला, अमरावती, बुलढाना, भंडारा, चांदा, नागपुर, वर्धा एवं यवतमाल जिले तत्कालीन बंबई राज्य को दिए गए, शेष राज्य तत्कालीन मध्यप्रदेश का भाग रहा।
2. सुनेलटप्पा के अतिरिक्त मंदसौर जिले की भानपुरा तहसील सहित पार्ट-बी का मध्यभारत, मध्यप्रदेश का भाग बना।
3. पार्ट-सी के भोपाल व विंध्यप्रदेश को मध्यप्रदेश में मिला दिया गया।
4. राजस्थान के कोटा जिले की सिरोंज तहसील मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में सम्मिलित कर दी गई।
1 नवम्बर, 1956में बने इस नये प्रदेश में 74 देशी रियासतों का इलाका शामिल था। प्रदेश की सीमा भारत के सात अन्य प्रदेशों क्रमश: आंध्रप्रदेश, महाराष्टÑ, गुजरात, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार और उड़ीसा को सीमाओं से मिलती थी। बस्तर जिला प्रदेश का सबसे बड़ा जिला था जिसका क्षेत्रफल 39 हजार 176वर्ग किलोमीटर था जो केरल प्रदेश के क्षेत्रफल से 307 वर्ग किलोमीटर अधिक था।
नए मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल रखी गई, जो सीहोर जिले की एक तहसील थी। इसकी भौगोलिक स्थिति 180 से 26030’ उत्तरी अक्षांश तथा 740 से 840330’ पूर्वी देशांतर थी। इसका क्षेत्रफल 4,43,446वर्ग किलोमीटर था, जो देश के क्षेत्रफल का 13.49 प्रतिशत था और यह क्षेत्रफल के आधार पर देश का सबसे बड़ा राज्य बना था। राज्य पुनर्गठन आयोग ने राजधानी के लिये जबलपुर का नाम सुझाया था। उसकी स्थिति सचमुच में केन्द्रीय थी। भोपाल जानता था कि अपने छोटे आकार के कारण वह स्वतंत्र इकाई तो रह नहीं सकता इसलिये भोपाल के मुख्यमंत्री डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने भोपाल को राजधानी बनाने के लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित किया। 9 अक्टूबर, 1955 में प्रहरी को एक साक्षात्कार देते हुए डॉ. शर्मा ने कहा था राजधानी के प्रश्न का निपटारा करते समय सरकारी कामों के लिये बिल्डिंग का प्रश्न प्रमुख रहेगा। दूसरे स्थानो की अपेक्षा भोपाल इस मामले में काफी भाग्यशाली है। सचिवालय आदि कार्यालयों के लिये इमारतों की संख्या काफी है। आवश्यकता पड़ने पर नवाब का अहमदाबाद की इमारतें प्राप्त हो सकती हैं। डॉ. शर्मा की दलील को नकारा नहीं जा सकता। यह एकदम सच है, इसलिये जब केन्द्रीय नेतृतत्व ने राजधानी का निर्णय किया तो भवनों के कारण भी भोपाल का पलड़ा भारी रहा, लेकिन केवल यही एक कारण नहीं था। डॉ. शर्मा के मुख्यमंत्रित्व काल में केन्द्रीय सरकार, विशेषकर नेहरूजी बहुत प्रभावित थे। लेकिन एक बड़ा राजनीतिकरण भी केन्द्र के नेतृत्व को प्रभावित कर रहा था। भोपाल नवाब ने अंत तक भारत विलय का विरोध किया। उनका पाकिस्तान के प्रति रुझान संदेहास्पद बना रहा। इसलिए भी भोपाल को राजधानी के लिये चुना गया।
जब पं. रविशंकर शुक्ल 31, अक्टूबर को नागपुर से भोपाल पहुंचे तो उनका हजारों लोगों ने स्टेशन पर जोरदार स्वागत किया। आधी रात को नये मध्यप्रदेश के प्रथम राज्यपाल, डॉ. पट्टाभि बी. सीतारमैया को मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस हिदायत उल्लाह ने पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलायी। इसके बाद पं. रविशंकर शुक्ल को मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री की तथा उनके मंत्रिमण्डल के सदस्यों को शपथ दिलायी गई। पं. शुक्ल को मिलाकर 12 कैबिनेट मंत्री थे और 11 उपमंत्री बने।
नये मध्यप्रदेश के गठन में महाकौशल और पं. रविशंकर शुक्ल की महती भूमिका थी। दुर्भाग्य से नये म.प्र. का प्रथम मुख्यमंत्री मात्र दो माह ही प्रदेश की बागडोर सम्हाल सका। एक नवंबर, 1956 को मध्यप्रदेश बना और 31 दिसम्बर, 1956 को वर्ष के अंतिम दिन, दिल्ली में मुख्यमंत्री पं. रविशंकर का देहावसान हो गया। 1 नवंबर, 2000 को मध्यप्रदेश का पुनर्गठन कर छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण किया गया। मध्यप्रदेश के 16 जिले इस नये राज्य का हिस्सा बने।
एक लंबे सफर के बाद स्थापना दिवस के रोज ही 1 नवंबर, 2000 को मध्यप्रदेश विभाजित हो गया। प्रदेश के पुनर्गठन से नये राज्य छत्तीसगढ़ ने आकार लिया। छत्तीसगढ़ राज्य बनाने की मांग तो काफी पुरानी थी, लेकिन इस मांग ने 1994 में आकार लेना प्रारंभ किया। छग के गठन के लिए 18मार्च, 1994 को तत्कालीन विधायक रविन्द्र चौबे द्वारा मध्यप्रदेश विधानसभा में पृथक छत्तीसगढ़ राज्य बनाये जाने की दिशा में अशासकीय संकल्प प्रस्तुत किया था, जो राज्य विधानसभा में संकल्प सर्वानुमति से पारित हुआ। इसके बाद 25 मार्च, 1998 को लोकसभा चुनाव के बाद अभिभाषण के बाद संसद में दोनों सदनों को संबोधित करते हुए राष्टÑपति के.आर. नारायणन ने अपने अभिभाषण में मध्यप्रदेश में से छत्तीसगढ़ राज्य बनाने के लिए कार्रवाई शुरू करने के संबंध में प्रतिबद्धता व्यक्त की। लोकसभा में छत्तीसगढ़ संशोधन विधेयक-2000 प्रस्तुत किया गया, जो 31 जुलाई, 2000 को लोकसभा में पारित हो गया। 9 अगस्त, 2000 को यह विधेयक राज्यसभा द्वारा भी ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। विधेयक में छत्तीसगढ़ के राज्यसभा सदस्यों की संख्या यथावत् रहने संबंधी संशोधन के साथ राज्यसभा में ध्वनिमत से पारित विधेयक को लोकसभा में पुन: प्रस्तुत कर पांच मिनट की समयावधि में पारित कर, राष्टÑपति के हस्ताक्षर के लिए भेजा गया। विधेयक राष्टÑपति के हस्ताार के बाद भारत सरकार के राजपत्र में अधिनियम संख्या 28के रूप में अधिसूचित किया गया। 24 अगस्त, 2000 को पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना से संबंधित प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी करने के लिए राज्य शासन द्वारा छत्तीसगढ़ प्रकोष्ठ का गठन कर दिया गया। इसके तहत 1 नवंबर, 2000 को छत्तीसगढ़ अस्तित्व में आ गया। छत्तीसगढ़ के अस्तित्व में आने के समय राज्य में 16जिले रायपुर, धमतरी, महासमुंद, दुर्ग, राजनांदगांव, कवर्धा, बस्तर, दंतेवाड़ा, कांकेर, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, कोरबा, रायगढ़, जशपुर, अंबिकापुर (सरगुजा) और कोरिया (बैकुण्ठपुर) और तीन राजस्व संभाग रायपुर, बिलासपुर और बस्तर थे। उस समय छत्तीसगढ़ क्षेत्र में 11 लोकसभा (5 सामान्य, 4 अनुसूचित जनजाति, 2 अनुसूचित जाति) और 90 विधानसभा क्षेत्र थे। 90 विधानसभा क्षेत्र में से 44 क्षेत्र सुरक्षित थे इनमें 34 अनुसूचित जनजाति और 10 अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित क्षेत्र थे।
छत्तीसगढ़ राज्य का उल्लेख रामायण, महाभारत तथा पौराणिक ग्रंथों में भी भिन्न-भिन्न नामों से मिलता है। उस भू-भाग का विस्तार दक्षिण में गोदावरी से लेकर उत्तर में नर्मदा तक मिलता है। समय के साथ ही इस राज्य का भू-भाग सिमटता गया और आखिरकार 1905 में इस भू-भाग के 5 देशी राज्यों को कालाहांडी, पाटणा, उड़ीसा में मिला दिया गया तथा बदले में छोटा नागपुर की 5 देशी रियासतों- सरगुजा, जशपुर, कोरिया व चांदभरवार को छत्तीसगढ़ में शामिल कर दिया गया था।
वर्तमान मध्यप्रदेश : आज मध्यप्रदेश में 51 जिले हैं। राज्य का क्षेत्रफल 3,08,245 वर्ग किलोमीटर है जो कि देश के कुल क्षेत्रफल का 9.38प्रतिशत है। मध्यप्रदेश क्षेत्रफल के आधार पर देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है।
वर्तमान में प्रशासनिक तौर पर 10 संभागों और 51 जिलों में बँटा मध्यप्रदेश सन् 1956को अस्तित्व में आया था, तब इसका निर्माण मध्यभारत, विंध्यप्रदेश और भोपाल राज्यों के साथ ही महाकौशल क्षेत्र के 14 जिलों जो पहले सी.पी. एण्ड बरार हिस्से थे को मिलाकर हुआ था। प्रदेश की स्थापना के समय मध्यप्रदेश में 43 जिले थे। 70 के दशक में सीहोर और राजनांदगाँव नामक दो जिलों के निर्माण से इनकी संख्या 45 हो गई। 1998में प्रदेश में 16 नए जिले बने और संख्या हो गई 61 छत्तीसगढ़ बनने के साथ ही 16जिले नए राज्य में चले गए और फिर संख्या 45 हो गई। वर्ष 2003 में बुरहानपुर, अनूपपुर और अशोकनगर जिले अस्तित्व में आए। इसके बाद वर्ष 2008में अलीराजपुर और सिंगरौली जिलों ने आकार लिया। इस तरह राज्य में कुल जिलों की संख्या 50 हो गई। इसके साथ ही दो नए संभागों और सात राजस्व अनुभागों व 80 नई तहसीलों का गठन भी वर्ष 2008से 2012 के मध्य तक भी हुआ। इन इकाइयों के गठन से प्रदेश में अब कुल 10 राजस्व संभाग, 51 जिले और 352 तहसीलें हो गई हैं। वर्ष 2008में प्रदेश में शहडोल और नर्मदापुरम दो नए संभाग का निर्माण होने के साथ ही अलीराजपुर और सिंगरौली जिले अस्तित्व में आए। वहीं फरवरी, 2011 में बुरहानपुर जिले में नेपानगर को और जून, 2012 में नरसिंहपुर जिले के तेन्दूखेड़ा, बालाघाट के कटंगी, छिन्दवाड़ा के चौरई, सागर के बीना और विदिशा के लटेरी एवं शमशाबाद को राजस्व अनुभाग का दर्जा मिला। प्रदेश में मई, 2008से 2012 के मध्य तक 80 नई तहसील सृजित की जा चुकी हैं। ये तहसीलें हैं हरदा जिले में सिराली, रहटगाँव और हंडिया, गुना जिले में बम्होरी और मकसूदनगढ़ अशोकनगर जिले में शाडोरा, बैतूल जिले में आठनेर, घोड़ाडोंगरी और चिचोली, मंदसौर जिले में शामगढ़ एवं दलौदा, पन्ना जिले में रेपुरा, अमानगंज, देवेन्द्र नगर, विदिशा जिले में शमशाबाद, त्यौदा और गुलाबगंज, छिन्दवाड़ा जिले में उमरेठ, चांद, मोहखेड़ और हर्रई, सतना जिले में कोटर और बिरसिंहपुर, उमरिया जिले में चंदिया और नौरोजाबाद, छतरपुर जिले में महाराजपुर, बक्सवाहा, चंदला और घुवारा, शिवपुरी जिले में बदरवास, बड़वानी जिले में अंजड़, पाटी और बरला, राजगढ़ जिले में पचोर, सीहोर जिले में रेहटी, जावर और श्यामपुर, रीवा जिले में मनगवां, सेमरिया, नईगढ़ी और जवां, सागर जिले में मालथोन और शाहगढ़, रायसेन जिले में बाड़ी, देवास जिले में हाटपिप्लिया और सतवास, टीकमगढ़ जिले में ओरछा, खरगापुर, मोहनगढ़ और लिधौरा, जबलपुर जिले में पनागर, सिवनी जिले में छपारा और धनोरा, धार जिले में डही, ग्वालियर जिले में चिनौर, इंदौर जिले में हातोद, खरगोन जिले में गौगाँव, खण्डवा जिले में पुनासा, खालवा, श्योपुर में बड़ोदा, बीरपुर, नीमच जिले में सिंगौली, जीरन और रामपुरा, मण्डला जिले में नारायणगंज और घुघरी, बालाघाट जिले में परसवाड़ा, तिरोड़ी और बिरसा, दतिया जिले में इंदरगढ़, होशंगाबाद जिले में डोलरिया, रतलाम जिले में ताल, रावटी, भिण्ड जिले में गोरमी, शहडोल जिले में बुढार और गोहपारू, सिंगरौली जिले में सरई और माड़ा और अलीराजपुर जिले में कठ्ठीवाड़ा और सोण्डवा तहसीलें शामिल हैं। 9 अक्टूबर, 2012 को हुई राज्य मंत्रिपरिषद की बैठक में 10 नई तहसील के गठन को अनुसमर्थन दिया और 2 नई तहसील के सृजन की स्वीकृति दी गई। जिन नवीन तहसील के गठन को अनुसमर्थन दिया गया, उनमें टीकमगढ़ जिले की लिधोरा, बालाघाट जिले की बिरसा, नीमच जिले की रामपुरा, छिन्दवाड़ा जिले की चाँद, सिंगरोली जिले की सरई और माढ़ा, अलीराजपुर जिले की सोण्डवा एवं कठ्ठीवाड़ा तथा शहडोल जिले की बुढ़ार और गोहपारू शामिल हैं। इन तहसीलों के लिये प्रत्येक तहसील के मान से एक तहसीलदार, एक नायब तहसीलदार, 5 सहायक ग्रेड-3 के पद सृजन की स्वीकृति दी गई गई। मंत्रि-परिषद ने खरगोन जिले के सनावद टप्पा कार्यालय का नई तहसील के रूप में उन्नयन करने की मंजूरी दी। साथ ही डिण्डोरी जिले के बजाग विकासखण्ड को तहसील बनाने की मंजूरी दी गई। इन तहसीलों में भी एक-एक तहसीलदार, एक-एक नायब तहसीलदार तथा 5-5 सहायक ग्रेड-3 के पद सृजित करने की अनुमति दी गई। इस तरह राज्य में प्रशासनिक इकाईयों का गठन आवश्यकतानुसार समय-समय पर होता रहता है।
जनसंख्या- जनगणना 2011 के अनुसार मध्यप्रदेश की जनसंख्या 7 करोड़ 25 लाख 97 हजार 565 हो गई है। राज्य की कुल जनसंख्या में 3,76,12,900 पुरुष एवं 3,49,84,645 महिलाएँ हैं। राज्य की कुल जनसंख्या देश की आबादी का 6 प्रतिशत है। जनसंख्या की दृष्टि से राज्य जनगणना 2001 के सातवें स्थान से जनगणना 2011 में छठवें स्थान पर आ गया है। पिछले एक दशक में मध्यप्रदेश की जनसंख्या वृद्धि दर 24.34 फीसदी से कम होकर 20.30 फीसदी हो गई है। इस तरह जनसंख्या वृद्धि में बीते एक दशक में 3.96 फीसदी की कमी दर्ज की गई।
धर्म : राज्य की बहुसंख्यक लगभग हिन्दू है। राज्य में छह धार्मिक समुदायों को अल्पसंख्यक घोषित किया गया है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार राज्य की कुल आबादी में अल्पसंख्यकों का अनुपात 8.15 है। राज्य में जो समुदाय अल्पसंख्यक घोषित किए गए हैं वे हैं मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी इन सभी अनुयाइयों की कुल आबादी 2001 की जनगणना के अनुसार 49,17,370 थी। इस संबंध में जनगणना 2011 के आँकड़े अप्राप्त हैं।
संसदीय व्यवस्था : विधानसभा राज्य की सर्वोच्च प्रजातांत्रिक संस्था है। इसमें 230 सदस्य निर्वाचन एवं 1 सदस्य मनोनयन के जरिए आते हैं। राज्य का लोकसभा में 29 और राज्यसभा में 11 सदस्य प्रतिनिधित्व करते हैं।
आजीविका : मध्यप्रदेश के अधिकांश लोगों की आजीविका कृषि और कृषि आधारित उद्योगों व व्यापार से जुड़ी है। प्रदेश में लगभग 150.70 लाख हेक्टेयर में खेती होती है।
भाषा और बोली : मध्यप्रदेश की प्रमुख भाषा हिन्दी है। राज्य के लगभग सभी लोग हिन्दी बोलते और समझते हैं। राज्य के भोपाल, सिरोंज, बुरहानपुर, कुरवाई आदि स्थानों पर उर्दू मिश्रित हिन्दी भी बोली जाती है। इन इलाकों की मुस्लिम आबादी उर्दू का भी उपयोग करती है। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों तथा बुंदेलखंड में बुंदेली, मालवा में मालवी, निमाड़ और बघेलखंड में बघेली बोलियों का प्रचलन व प्रभाव है। राज्य के आदिवासी झाबुआ, मंडला, डिंडोरी, बालाघाट और सिवनी के जनजातीय क्षेत्रों में भीली और गौंडी जैसी जनजातीय बोलियों का भी प्रचलन है।
ग्रामीण व शहरी आबादी : मध्यप्रदेश मूलत: गाँवों में बसा राज्य है। राज्य की कुल जनसंख्या का 72.4 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करता है। 2011 जनगणना में राज्य मे ंग्रामीण जनसंख्या का सर्वाधिक अनुपात 95.4 डिंडौरी जिले में दर्ज किया गया, जबकि सबसे कम अनुपात भोपाल जिले में 19.2 फीसदी पाया गया। 2011 की जनगणना के समय जहां राज्य की कुल आबादी में से नगरीय आबादी का आकार 2,00,59,666दर्ज किया गया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here